Sunday, July 19, 2009

मुरारी और उल्लू में समानता !!

नमस्कार,
अपना नाम करने के चक्कर में मैंने अपने ही ऊपर लेख लिख कर टेलेग्राफ पेपर मैं भेजा,और प्रकाशित भी हुआ,पर जिस दिन मेरा लेख प्रकाशित होना था, उसी दिन उल्लू पर भी लेख प्रकाशित हुआ,अब क्या बताऊँ की क्या हुआ, मेरे नाम की जगह उल्लू का और उल्लू के नाम की जगह मेरा हो गया राम जाने क्या हेर फेर हुई, खैर लेख कुछ इस तरह था!
उल्लू !! ये नाम सुनते ही लोगों के होठों पर हंसी अपने आप ही आ जाती है, ये उल्लू पिछले २५ साल से कॉमेडी करता आ रहा है, देखने मैं बहुत शांत पर इसकी फितरत मैं कॉमेडी कूट कूट के भरी हुई है, बस मुह से बात निकली नहीं की कॉमेडी बन गयी! और भगवान् ने इस उल्लू को गला भी ऐसा बख्शा है की बोलते ही लोगों को हंसी आ जाये, जब भी ये उल्लू कहीं गमगीन माहोल देखता है धीरे से अपनी बात सरका देता है, कई जगह तो ये उल्लू पिटते पिटते बचा, एक बुजुर्ग की मौत पर जहां मातम हो रहा था, उल्लू बोल पड़ा "जब जिन्दा था तो उसको मारने की जल्दी थी अब मर गया तो हाय क्यूँ मर गया अब किसको कोसेंगे " लोग बरस पड़े, पर सबको मालूम था की बेचारा आदत से लाचार है ये उल्लू !!
ये लेख मेरे लिए प्रकाशित हुआ, और दूसरी तरफ उल्लू पर जो लेख लिखा गया वो इस तरह था!
"मुरारी" नाम सुनते ही शारीर मैं कंप कम्पी सी दौड़ जाती है, मुरारी रात को ही निकालता है,लोगों का मानना है की मुरारी बहुत बहुत मुर्ख होता है इसीलिए ये कहावत बन गई की मैंने तुम्हे मुरारी बना दिया, या तुम तो बिलकुल ही मुरारी हो, मुरारी का पठ्ठा,लेकिन धर्म ये मुताबिक ये लक्ष्मी की सवारी भी है लक्ष्मीजी की फोटो के नीचे बैठा मिलेगा मुरारी ! मुरारी की बड़ी बड़ी आँखें बहुत डरावनी होती हैं, आंखें जीतनी डरावनी है चेहरा भी चकोर और भयानक है, और आवाज तो इतनी भयानक है की सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते है,

तांत्रिक क्रिया मैं मुरारी की अहम् भूमिका बताते है, कहते हैं मुरारी की खोपडी मैं काजल बना के लगाया जाये तो सम्मोहन दृष्टि प्राप्त होती है, और मुरारी की हड्डियों की राख़ का सुरमा आँखों मैं लगाया जाये तो भुत भविष्य सब दिखाई देते हैं, इसीलिए तंत्र क्रिया करने वाले इनके जान के पीछे पड़े रहते हैं,
अब ये लेख छपने के बाद लोग बन्दूक ले कर मेरे पीछे पड़ गए हैं,कईयों ने तो घरवालों को अडवांस पैसे दे दिए की मरने के बाद खोपडी और हड्डी हमें दीजियेगा.दुसरे दिन उसी समाचार पत्र मैं माफीनामा भी प्रकाशित हुआ, कुछ इस तरह.कल जो दो लेख हमने प्रकाशित किये थे उल्लू के ऊपर और मुरारी के ऊपर दरअसल जो मुरारी था वो उल्लू था, और जो उल्लू था वो मुरारी था, अब लोगों की समझ मैं आगया की मुरारी उल्लू ही है !!!!

Saturday, July 18, 2009

चुन्नी लालजी का गुस्सा ! गुबरीले पे

(हास्य सत्य घटनाए)
चुन्नी भैया के कारनामे इतने हैं की एक रामयाणाकार पुस्तक प्रकाशित की जा सकती है| एक बार दोस्तों के साथ बैठे पतियाँ खेल रहे थे |
एक गुबरीला(गोबर मैं रहने वाला जीव) उनकी तरफ आता है और पैर पे चढ़ने लगता है | अब चुन्नी लालजी उसे पकड़ के दूर फेंकते हैं | फिर खेलने में व्यस्त | गुबरीला फिर आता है, और उनके पैर पे चढाने लगता है|
चुन्नी लालजी फिर उसे हाथ से पकड़ के दूर फेंकते हैं, धीरे धीरे कुछ बुदबुदा भी रहे हैं| अब साथी लोग शिकायत करते हुए कहते हैं : अरे के हुयो चुन्नी पत्ता डाल |
चुनी : अरे डाल रहा हूँ यार | चुन्नी भैया हार रहे हैं इतने में गुबरीला आदतन फिर आता है|( गुबरीले के बारे में ये कहावत है की जिधर से फेंकते हैं मुड़कर फिर उसी दिशा में जाता है ) जैसे ही चुन्नी भैया के पर पे चढ़ता है | क्रोधित सांड के माफिक गुबरीले को हाथ में पकड़ते हैं, और दौड़ लगाते है गाँव के खाली पड़े कुए की तरफ | अब कुवे के पास पहुँच कर गुबरीले को कुवें में फ़ेंक देते है | और फिर जोर से आवाज लगाते हैं: आजा !!! अब आजा !!! आ के दिखा मैं दो घंटा यहीं हूँ आ !! आजा !!! आता क्यूँ नहीं!!!

Wednesday, July 15, 2009

आखिर चोट माथे पे कैसे लगी!!

चुन्नी लालजी के किस्से बहुत सारे है | सब हकीकत कोई मिलावट नहीं एक दम शुद्ध गांवलिया |
किसान आदमी को बहुत सारे काम रहते हैं ऑफ सीज़न में भी | ऐसे ही एक बार हल की रेपैरिंग करने बैठे थे | सोचा आगे खेती की सीज़न आ रही है | हल को थोडा ठीक ठाक कर लिया जाए | तो हल के अन्दर जो लोहे की पत्ती होती उसे निकालने में लगे हैं ! अंगने में लम्बी टांगो को जमीन पर पसार कर बेठे और दोनों हाथों से खिंच कर हल की पत्ती को निकालने का प्रयास करने लगे | कोशिश करते करते अचानक पत्ती निकल गई | सर को पूरी तरह ऊपर झुका रखा था | फलस्वरूप झटके से निकली पत्ती सीधी माथे पर जा लगी और माथे पर खरोंच आ गई, पर ज्यादा चोट नहीं आई|
पर चुन्नी लालजी दहाड़े मार मार कर रोने लगे |लोगों को आश्चर्य हुआ |
वहाँ उपस्थित लोगों ने समझाया : अरे चुन्नी भैया ज्यादा चोट नहीं आई इतना क्यों रो रहे हो?
चुन्नी भैया बोले - इसलिए नहीं रो रहा की चोट लगी है, इसलिए रो रहा हूँ, की अब किस किस को बताउंगा की चोट कैसे लगी ? पूछने वाले पूछ पूछ के मार लेंगे, की हल की पत्ती की चोट आखिर सर पे कैसे लगी ? बार बार कुवे में भी नहीं कूद सकता !!!

Monday, July 13, 2009

लुढ़क लोटे लुढ़क !!!

चुन्नी लाल जी की चर्चा जब कर ही रहा हूँ, तो उनके किस्से आगे सुनाता हूँ!
चुन्नी भैया तो ब्लॉग देखने से रहे | अगर भूले भटके देख लिया तो मेरी खैर नहीं | पर जब औंखली में सर दे ही दिया तो मूसलों से क्या डरना!!
चुन्नी भैया वैसे किसान आदमी हैं | अच्छी जमीन है खुद ही हल जोतते हैं | मेहनती इंसान है |
चाय के बड़े रसिया है, जब चाय पीते है तो किसी प्रकार की दखलंदाजी पसंद नहीं करते है | एक बार जब खेत में हल जोतने गए | खेत भी गांव से लगभग 9 किलोमीटर (तीन कोस) और वो राजस्थानी रेतीला इलाका, जहां चलने पर लगता है एक ही जगह पर रेत पैरों से आटे की तरह सान रहें हैं |
खेत पहुँचने के बाद पुरे दिन खेत की जुताई की | शाम का वक़्त घर आने की तैयारी | बड़ी तबियत से सारा दूध डाल कर चाय बनाई और सोच रहे हैं : आह बड़ी बड़ी चुस्कियां ले कर चाय पिउंगा और फिर रवाना होउंगा ! यही सोचते हुए चाय छान रहे हैं लोटे में |
पूरी चाय छान चुके लोटे में पिने की हड़बड़ी में लोटा लुढ़क गया, और सारी चाय रेत के समंदर में समा गयी | चुन्नी लाजी का गुस्सा जाग उठा !!!
खड़े होकर लोटे को ठोकर मारी और बोले :में तो चाय पिए बिना ही रह जाउंगा तू तो लुढ़क | और सज्जनों सच मानो उस लोटे को ठोकर मारते मारते गाँव की तरफ ला रहे हैं और यही बात दोहरा रहे हैं :में तो चाय पिए बिना ही रह जाउंगा तू तो लुढ़क !! लुढ़क!! लुढ़क!!

Friday, July 10, 2009

बकरा पांच सौ मैं बेचा

हमारे गाँव के चुन्नी लालजी बड़े गुस्सेल और चिडचिडे स्वभाव के व्यक्ति हैं | उनके पास एक बकरा है और वो उस बकरे को बेचना चाहते थे | पर कोई अच्छे दाम देने वाला मिला नहीं | गांव में कोई भी बकरे का व्यापारी आता है, तो गांव वाले ऊँगली सीध करते हैं चुन्नी लालजी की|
बताते हैं की : बकरा तो है चुन्नी भैया के पास जाओ ले लो|
अब व्यापारी आया चुन्नी लालजी के घर पे : जय रामजी की जी चुन्नी लालजी!!
चुन्नी लालजी: जे रामजी बोलो क्या बात है ?
व्यापारी: आपके पास बकरा बताया है!
चुन्नी लालजी: हाँ है तो??
व्यापारी : क्या भाव ताव है?
चुन्नी लालजी: ये देख ले बकरा अब बता कितने देगा ?
व्यापारी: देखिये इस बकरे के मैं आपको आठ सौ रुपये दे सकता हूँ!!
चु.ला : नहीं देना है, जा कहीं दूसरी जगह मिलता है तो ले ले|
इस प्रकार कई व्यापारी आये एक हजार रूपये तक दर मुलाई कर गए पर चुन्नी लालजी को लग रहा है जैसे वो बकरा नहीं ऊंट बेच रहे हैं| अब चुन्नी लालजी ने सोचा क्यूँ न मंडी जाया जाये और अच्छे दामों में बकरा बेचकर आया जाए |मन बनाया अगली सुबह चार बजे ही बकरे को ले के चल दिए मंडी, जो की गांव से २५ किलोमीटर दुरी पे है| पैदल चलना राजस्थानी गर्मी मैं वो भी चुरू जिले की गर्मी जहां रिकार्ड गर्मी पड़ती है | ८ -९ बजे पहुंचे मंडी वहाँ चारों तरफ घूम फिरने के बाद बकरा बिका मात्र पांच सो रुपैये मैं|अब क्या करें कहावत हैं ना की "चोर की माँ किसमे मुह दे के रोवे"| बकरा बेच के जैसे तैसे गाँव लिया |
अब गाँव का तो आपको पता ही है, लोगों को काम धाम रहता है नहीं बस कोई मिला की हालचाल पूछ लिया | वही हुआ गाँव मैं घुसते ही भानारामजी मिल गए पूछ बैठे : अरे चुन्नी काका कहाँ से आ रहे हो?
चु.ला: अरे शहर गया था?
भानारामजी: शहर क्यों भई?
चु.ला: अरे बकरा बेचने गया था|
भाना: ओहो हाँ तुम्हारे एक बकरा था|
चु.ला :के बात कर रिये बकरा मेरे नहीं बकरी का था|
भाना: हाँ हाँ वही कह रहा हूँ काका ! अच्छा कितने में बेचा काका?
चु.ला: पाच सौ में |
भाना : काका तेरा तो दमाग फिरग्या गाँव मैं बेपारी आया था तने १००० रुपैये तक दे रया था , नहीं बेचा, शहर जा के पांच सौ मैं बेच के आया ? वाह र काका?
चु.ला: अरे ज्यादा बकवास मत करिए, मेरो बकरों मैं बेच्यो तने के तकलीफ जा काम कर तेरो|
अब भाना रामजी से निपटने के बाद आगे मिल गए सीतारामजी | कमजोर दृष्टि से पहचानने की कोशिस करते हुए बोले :अरे कौन है भाई ?
चु.ला: चुन्नी हूँ काका |
सीतारामजी: अरे चुन्नी कहाँ जा कर आ गया?
चु.ला: शहर गया था काका |
सीतारामजी: अरे शहर किस काम से गए थे ?
चु.ला: अरे अपना वो बकरा बेच के आ रहा हूँ|
सीतारामजी: अच्छा अच्छा !! वो बकरा बेच दिया ? कितने मैं बेचा ??
चु.ला: पांच सौ रुपैये मैं बेचा काका |
सीताराम : र सित्यानाश जा तेरा !! गांव मैं बेपारी १००० रुपये दे रया था नहीं बेचा वहाँ बाप का नाम निकाल के आया है?? (मुह बनाते हुए) पांच सौ मैं बेचा!!
चुन्नी लाल का पारा सातवें असमान पे : रे काका मुह संभाल कर बात करियो !! काकाई धरी रे ज्यागी!! तन्ने क्यूँ पीढ होवे मेरो बकरों मेरो लेण मेरो देण चल भग्ज्या!!!
अब काका सीताराम रस्ते लग लिया | चुन्नी लालजी यात्रा और पूछ ताछ से परेशान,की आगे किशन लालजी मास्टर मिल गए |
किशन लालजी : अरे एक मिनट, चुन्नी भाया!! कहाँ से आयो?
चुन्नी लालजी गुस्सा तो बहुत आ रहा है पर क्या करें मास्टरजी हैं सो बताना तो पडेगा वरना लड़के की पढाई मैं व्यवधान |
चु.ला: अरे मास्टर यार शहर गयो थो |
मास्टरजी: ओहो !!शहर किस काम से गयो थो भाई?
चु.ला: अरे अपना वो बकरा था ना वो बेच के आ रहा हूँ |
मास्टरजी : अच्छा !!!! वो बकरा आखिर बेच ही दिया कितने रुपये बँटे भाई?
चु.ला: अरे यार क्या बने पाच सौ में बेचा |
मास्टरजी : रे बावली बुच्च घणा होशियार बणे था तू तो, गाँव मैं १००० रुपैये मैं भी नहीं बेचा और शहर जा कर ५०० में बेचा!! तू पागल होगया की होने जा रहा है?
चु.ला: रे ओय मायटर छोरान ने पढाने स्यूं मतलब राख ज्यादा मने पाठ पढाने की को़शिश ना करिए ! नई तो तेरा पढा पाठ सारा भुला दूंगा !! चाल रास्तो नाप |
मास्टरजी चुप चाप निकल लिए |
पर गांव मैं आदमी तो रस्ते पे मिलेंगे ही | थोडी दूर चले नई की जोरू राम जी मिल लिए |
जोरू: अरे कोण जा रियो है र ?
चु.ला: ताऊ मैं हूँ चुन्नी (ऊँची आवाज मैं) |
जोरू : अरे चुन्नी कहाँ से आ रियो है बेटा ?
चु.ला.: ताऊ शहर गयो थो |(अब अगला प्रश्न चुन्नी लाजी के लिए बड़ा ही भारी था)
जोरू: शहर क्यूँ गयो थो बेटा? इतना बोलना हुआ की चुन्नी लालजी वहाँ से दौडे, दौड़ते दौड़ते गाँव के पुराने कुवे के पास पहुंचे| जो सुखा था | चुन्नी लालजी ने कुंवे मैं छलांग लगा दी | अब बात आग की तरह पुरे गांव मैं फैल गई | आस पास के गांव मैं फैल गयी ! मीडिया को पता लग गया | पत्र कार,कथाकार जितने भी कार बेकार थे सब कार ले ले कर आ गए | टी वी चेनल वाले भी पहुँच गए चुन्नी लालजी को निकलने के इन्तजाम किये गए | ऊपर से किसी ने आवाज लगाईं : चुन्नी लाल जी जिन्दे हो क्या!!!!!!!!!!!!!!|
कुंवे के अन्दर से आवाज आई: जिंदा हूँ जिंदा|
फिर ऊपर से किसी ने बोला : अरे भाई जिंदा हो तो हम निकलने का इन्तजाम करते हैं|
चुन्नी लालजी अन्दर से बोले :निकलने का इन्तजाम छोडो !!!
पहले ये बताओ गाँव के सारे लोग इक्कठा हुए की नहीं???
ऊपर से : अरे गाँव के ही नहीं आस पास के गाँव और मीडिया वाले भी इक्कठा हो गए हैं |
चुन्नी लालजी बोले : तो सबको बता दो की वो बकरा मैंने पांच सौ रुपये में बेचा था!!!!!! एक एक को बताना मेरे लिए मुश्किल है !!!

Saturday, July 4, 2009

पैदाइशी सुन्दरता

अपने मुह से अपनी तारीफ़ नहीं किया करते, पर क्या क्या करूँ वाकिया ही ऐसा घटित हुआ, की अगर अपनी महिमा न बताऊँ तो बात अधूरी रहेगी !! पैदाइशी सुन्दरता के कारण मुझे घर से सख्त आदेश थे की बिना बुर्का या मुह ढके घर से बाहर न निकलूं !! पुरे गली मोहल्ले के लोग एक झलक पाने को बेताब रहते थे !! पर चेहरा देखना तो जैसे दुर्लभ दर्शन थे | गाँव मैं किसी को भी मेरी सूरत का अंदाज आज तक नहीं है!! बुर्का हटाने का खामियाजा मुझे तब उठाना पडा जब मैं चिडिया घर देखने गया!! मैं गुवाहाटी के चिडिया घर मैं पहुंचा तो वहाँ तरह तरह के जीव जंतु देश और विदेश से लाये गए दुर्लभ और सुलभ सभी प्राणी थे!! बहुत सारे लोग हुक्कू मंकी का आनंन्द ले रहे थे, लोग हुक हुक करते बन्दर भी वापिस जोर से हुक हुक करके हुकलाता!! अच्छी भीड़ थी!! मैं घूमता घूमता एक जगह पहुंचा जहां पर शीशे के भीतर कुछ था!! मैंने बुर्का उतार लिया !! शीशे के अन्दर झांका देखा एक ख़ास किस्म का बन्दर जिसने कपडे पहन रखे थे !! मैंने उसको हाथ दिखाया ! उसने भी मुझे हाथ दिखा कर उतर दिया! मैं मुस्कुराया !! मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब जवाब मैं वो भी मुस्कुराया !! अब तो मैं उसके साथ आनंद लेने लगा !! मैं जैसे अपनी मुद्रा करते वो हाथो हाथ वैसे ही reply करता !! सच मैं बन्दर बड़े नकलची होते हैं, मैं मन ही मन सोच रहा था !! मैं अपने काम मैं मशगुल था ! ध्यान पीछे गया देखा जो भीड़ हुक्कू मंकी के पास थी अब वो शीशे वाले बन्दर के पास इक्कठी थी!! मैंने उनकी परवाह किये बिना उस बन्दर के साथ लगा रहा !!लोगों का जमावडा हमारी हरक़तों का आनंद उठा रहा था !! तभी देखा main गेट की तरफ से बहुत सारे लोग हाथों मैं केमरे लिए हमारी तरफ आ रहे थे !! मुझे समझते देर ना लगी की ये हमारी हरकतों को टी वी पर प्रसारित करने वाले हैं !! एक केमरा धारी मेरे नजदीक आया !! मैंने थोडी जगह छोड़ी !! वो बोला नहीं नहीं ठीक है ! केमरा मुझे शूट किये जा रहा था ! और ताबड़ तोड़ फ्लेश लाइटें मेरे चेहरे पे !! मैं समझ नहीं पा रहा था आखिर क्या माजरा है! मुझे लगा मैंने इस बन्दर को छेड़ के अच्छा नहीं किया !! मन ही मन अपने आपको कौसते हुए कहा रहा था तुझे क्या पड़ी थी मुरारी इस बन्दर को छेड़ने की पता नहीं अब क्या होगा!! एक पत्रकार ने मुझसे सवाल किया : सर आपसे एक बात पूछें ?? मैं बोला: एक क्यूँ बहुत सारी पूछिये !! पत्रकार महोदय धन्यवाद देते हुए बोले:: आप कब से ऐसे हैं?? मेरे दिमाग की घंटियाँ घनघना उठी मुझे यकायक ध्यान आया की मैंने बुर्का हटा दिया है | सारा माजरा समझ मैं आ गया की हो न हो मेरी सुन्दरता का जलवा बिखर गया है !! मैं कुछ सरमाते हुए बोला: जी बचपन से ही हूँ !! बुर्का लगाके रहता हूँ पर आज बुर्का भूल से खोल दिया !! पत्रकार महोदय मेरे और करीब आकर मुझसे हाथ मिलाते हुए बोले : ये तो भगवान् का दिया रूप है छुपाना क्या !! मैं बोला: वो तो ठीक है अब घर मैं कौन समझाए !! माँ को लगता है किसी की नजर लग जायेगी !! एक दुसरे सज्जन पास आये बोले शाम को "आजतक" चेनल देखिएगा आपका फोटो आयेगा!! जैसे तैसे वहाँ से निकला, निकलने से पहले बुर्का लगाना नहीं भुला !! घर पहुंचा आजतक चेनल खोल के बैठ गया!! अचानक देखा गुवाहाटी का चिडियाघर दिखा रहे थे !! एक रिपोर्टर चिल्ला चिल्ला के बोल रहा था: नमस्कार ये नजारा है गुवाहाटी के चिडियाघर का घर का यहाँ आज एक अजीब किस्म का बन्दर देखा गया !! मैं समझ गया की उशी शीशे वाले बन्दर की बात की जा रही है मैं उत्सुकतावश देखता गया की अभी मेरी भी फोटो दिखेगी!! पर देखा मैं कहीं नहीं था बस एक बन्दर था जो शीशे मैं देखकर अजीब अजीब हरकतें कर रहा था !! अचानक उस बन्दर के पास एक आदमी आया उससे वही बातें पूछ रहा था जो उसने मुझसे पूछी थी !! मैं मन ही मन सोच रहा था की कैसा कंप्यूटर का ज़माना आगया क्या मिक्सिंग की है, मुझे हटा कर बन्दर को लगा दिया!! पर जब उस बन्दर ने अपने चेहरे पर बुर्का लगाया तो मुझे बड़ा अजीब लगा !! मैं बाथरूम के शीशे की तरफ बढा|
घर की तरफ से शीशा देखना मुझे सख्त मना था!! पर आज तो देख के ही रहूंगा !! बाथरूम के अन्दर घुसा शीशे के ऊपर से कपडा उठाया और शीशे मैं झांका वही बन्दर जो चिडिया घर मैं देखा था शीशे अन्दर से झांक रहा था !! अब सारी वारदात समझ मैं आगई !! अपनी सूरत को अब कैसे दिखाऊं किसी को, बुर्का लगाया !! माँ के पास आया !! और माँ से बोला : माँ मुझे अपनी असली सूरत का पता चल चुका है !! पर मैं इतना बदसूरत क्यूँ हूँ!! माँ बताने लगी: बेटा हमने तुम्हे पाने के लिए शंकर भगवान् की बड़ी तपस्या की !! एक दिन जब भगवान् प्रगट हुए तो हमने संतान की मांग की !! शंकर भगवान् बोले: अभी कोई संतान स्टॉक मैं नहीं है! पर मैं जिद करती रही !! और भगवान् को भक्तों की जिद के आगे झुकना पङता है!! शंकर भगवान् ने उछल कर पेड़ से एक बन्दर पकडा और पूछ काट के पकडा दिया बोले: ये लो !! अब सारी बात समझ मैं आगई की क्यूँ मैं बंदरों की सी हरकतें करता हूँ !!

Monday, June 22, 2009

चिरक देवजी

मैंने एक व्यंग पहले भी कसा था पर वो राजस्थानी भाषा मैं होने के कारण सभी की समझ मैं नहीं आया इसीलिए हिंदी रूपांतरण पेश कर रहा हूँ| हमारे हिन्दू धर्म मैं कितने देवी देवता हैं कोई बता सकता है?? हाँ बता सकता है 33,000,000 || न इससे कम न इससे ज्यादा | अब ज़रा कोई भाई इनके नाम भी गिना दे तो बड़ी मेहरबानी होगी!! प्रचलित देवी देवताओं को डिपार्टमेन्ट वाइज सबको विभक्त किया गया है, मौसम विभाग के देवी देवता अलग हैं, ज्ञान ध्यान के अलग हैं, धन दौलत के अलग और, वीर शौर्य के अलग, सबकी अपनी अपनी टीम है, अपनी अपनी महिमा है, खैर अब जिन देवी देवताओं को हम नहीं जानते उनमे से एक का किस्सा मैं आपको बतलाने जा रहा हूँ||गांवों मैं आज भी ब्राह्मणों का दबदबा है, पंडितजी ने बोल दिया तो बस लोहे की लकीर है, पंडित जी बोल दिया की आज तिथि साठ्युं (६०) है तो कोई माई का लाल नहीं की उन्सठ्युं (५९) कर सके ||तो उसी ब्राह्मणों के मोहल्ले मैं एक गरीब हरिजन प्रजाति(प्रजाति कहने का तात्पर्य यहाँ ये है की उन्हें पशु सामान समझा जाना ) की महिला अपने शिशु को गोद लिए गयी | और बच्चे को अतिसार की शिकायत थी |जैसे ही वो मंदिर के नजदीक से गुजरी की शिशु ने चिर्क दिया (राजस्थानी भासा मैं चिर्क का मतलब दस्त, जो छोटा बच्चा करता है, बडो पर ये लागु नहीं होता बडो के दस्त को तो तल्डा कहते हैं )| अब जैसे ही बच्चे ने चिरका तो बेचारी दरिद्र महिला का मन भय से कांपने लगा || काटो तो खून नहीं, एक तो चिरका दुसरा ब्राह्मणों का मोहल्ला और उस पर भी गाज गिरी तो मंदिर के सामने, कुछ समझत आती की उससे पहले ही पंडितजी मंदिर से बाहर निकले , अब जैसे ही पंडित जी को देखा बेचारी दरिद्रा के पैर काम्पने लगे और जमीन पर बैठती हुई अपने सर को झुमाने लगी !! पंडित जी ने नजारा देखा पर उनकी समझ से परे था | पंडित जी ने पूछा : कोन है ? हरिजन महिला झूमते हुए बोली : धन्य हो! धन्य हो! महाराज !आपके गाँव पर और आपके ऊपर परमात्मा की अनुकम्पा हुई है ?? पंडितजी आश्चर्यचकित थे जैसा भी टूटा फुटा दिमाग चला सकते थे चलाया और निस्कर्स यही निकाला की हो न हो इस औरत मैं किसी देवता का शाया है अपने दोनों कर जोड़ कर विनीत भाव से नतमस्तक होते हुए गद गद गले से बोले : हे माते !! मुझे पूरी बात बताएं?| महिला ने सर झुमाना जरी रखते हुए बोली: हे भले ब्राह्मण भगवान् की तुम पर अति कृपा है ! परमात्मा का कल्कि अवतार तुम्हारे गांव मैं हुआ है !! पंडितजी विस्मय थे रुंधे गले से बोल नहीं निकल पा रहे थे | प्रेमाश्रुओं की झड़ी जैसे चेरा पूंजी मैं सावन आगया हो |महिला ने अपनी अंगुली से चिरका दिखाते हुए पंडितजी को कहा: ये देखो भगवान् का कल्कि अवतार "चिरक देव जी" || महिला ने कहना जरी रखा: अमृत्बेला के स्वप्न मैं प्रभु ने दरश दिए और श्री वचन उच्चारण किये बोले हे गंगली उठो और प्रभु कार्य मैं अपनी भूमिका निभाओ जाओ और गांववालों को बताओ की मेरा कल्कि अवतार ब्राह्मणों के मोहल्ले मैं मंदिर के सामने होगा || और सबके दुःख दर्द मिटाने मैं "चिरक देव" के नाम से जाना जाउंगा | अब इतना सुनना था की पंडितजी दंडवत करते हुए जोर से टिल्ली मारी : चिरक देवजी की जय"| अब क्या था आग की तरह बात गांव भर मैं फैल गयी श्रधालुओं की भीड़ लग गयी | पुरे गांव के लोगों ने चिरक देवजी की आरती की | हाथों हाथ चिरक चालीसा चिरक स्तुति बन गयी वो तो गाँव मैं लोग ब्लॉग के बारे मैं नहीं जानते थे वरना चिर्क्देव.ब्लागस्पाट .कॉम बनते देर कहाँ लगाने वाली थी | अब बात अगर यहीं समाप्त हो जाती तो कोई बात नहीं थी !! पर चिरक देव जी का चर्चा और पर्चा दूर दूर तक फेलने लगा | लोग दूर दूर से आने लगे अब khyaati इतनी फैल गयी तो बाबा लोगों ने एक बड़ा हवन करने की योजना बनाई गयी ! पुरे देश भर में पर्चे बंटवाये गए, बड़ी बड़ी कंपनियों को स्टाल लगाने के लिए कहा गया, और चिरक कथा, चिरक चालीसा, का कई भाषाओँ मैं रूपांतरण किया गया, और स्टाल लगा दिया गया| चिरक ताबीज,चिरक लहरी, चिरक झंडे, लगा के लोग गुणगान करते नहीं थकते, भव्य मंदिर बनाया गया,| अब बारी थी मीडिया की सभी चैनल वाले अपना केमेरा ले कर पहुँच गए : नमस्कार फलाने गांव मैं हुआ चिरक देवजी का अवतार ये देखिये ये हैं चिरक देवजी, अपना कलियुगी रूप लिए हुए करोडो भगतों का उद्धार करने आये हैं!! वगेरह वगेरह !! अब और क्या बताओं चिरक देवजी के मंदिर जा कर खुद ही दरसन करके आइये || ओम उदर्श्च निवाशय: chirkaay: नम:!!

Tuesday, June 16, 2009

जय बाबे की !!

क्या आप किसी धार्मिक स्थलों का दौरा करने जा रहे हैं ?? भाई माताजी को मेरा भी नमन कहना,बालाजी को प्रणाम, साईं बाबा को सलाम, क्या करूँ मेरा जरासा जाने का मन नहीं हो रहा, अरे भाई आप जहां जा रहे हैं बड़ी भीड़ है, वहाँ लम्बी कतार होगी, पुरे दिन से भूखे प्यासे खड़े लोग होंगे, न जाने कितनी बिमारियों वाले, कितने प्रेतों के सताए, दुखी मानव का एक ही सहारा है| श्रद्धा से भरे लोग, प्रेमाश्रुओं की झड़ी लगाते जाते हैं, जब रास्ता तय करते हैं तो, पहुँचने की जल्दी,अब ख़ुशी का पारा सातवें आसमान पर है अब तो पहुँच गए माता के धाम, मैया रानी को बड़े स्नेह से बड़े प्यार से निहारूंगा चरणों में लोटूंगा,लोटिया लोट हो जाउंगा | लेकिन ये क्या इतनी लम्बी लाइन, इस लाइन मैं आज नंबर आयेगा मुश्किल है| क्या करूँ ?? | मैं: हेल्लो भाई साहब वो उधर देखिये छोटी लाइन उसमे लगिए | आप: ओह धन्यवाद ! पर वहाँ बाकि लोग क्यों नहीं जाते?? | मैं: अरे भाई वो लाइन वी आई पी है | आप: ओह !! | मैं: वड्डे वड्डे लोगां की लाइन है भाई !!| आप: ओह क्या करूँ मैं तो बड़ा आदमी नहीं हूँ ?? | मैं: क्या बात करते हो ? बड़े बनने मैं कितना वक़्त लगता है यार पांचसो का पत्ता है? | आप: हाँ मिल जायेगा ! | मैं: तो बन गए बड़े आदमी वो जो पंडा घूम रहा है उससे कान्टेक्ट करो !
आप: हेलो पुजारीजी !! | पुजारी: क्या बात है? आप: ज़रा उस लाइन मैं मेरी भी व्यवस्था कीजिये न ?पुजारी: अरे भाई वो बड़े लोगों की लाइन है | आप : मैं भी छोटा नहीं हूँ ये देखो पांच सो का पत्ता |
पुजारी : आइये आइये |
हूँ आखिर दरसन हो गए माताजी के भाई साहब आपको चरणों मैं लोटे की नहीं | आप: नहीं भाई वहाँ तो ठीक से दर्शन भी नहीं करने देते कितने जोश से गया था ??
मैं: ओह लगता है आप पहली बार गए थे ?? क्यूँ क्या घर पे माताजी, बालाजी, साईं बाबा आते नहीं क्या | आपसे कोई माताजी बालाजी की कोई दुश्मनी है? जितना प्रशाद चढाते हो वही प्रसाद फिर बाज़ार मैं बिकता है| उशी प्रसाद से कितने आलसी बाबा मजा करते हैं, भाई मेरी बाबाजी लोगों से कोई दुश्मनी नहीं है, पर वो जब बाबाजी बन ही गए हैं, तो एक भी कोई मुझे सच्चा बाबजी बता दो जिसको मैं गौतम बुध्ध, साईं बाबा, या फिर कोई सच्चा साधू जिसको देखने से आत्मा प्रेम विभोर हो उठे | जिसकी आत्मा मैं इतनी शांति और शकुन हो की दृष्टी मिले तो निहाल हो जाऊं, प्रेम से आत्मा का अहसास हो मन हल्का हो कर उड़ने लगे | अगर नहीं है तो फिर इससे अछे मेरे बाबाजी हैं, पिताजी के बड़े भाई जो प्यार से निहारते हैं !!

Thursday, June 11, 2009

थूक वाले बाबा

साधू महात्माओं का बढ़ता संसार अजीबो गरीब बाबे, कामख्या गुवाहाटी मैं अम्बुवासी मेले में एक बाबा मुझे मिले जो की चिवंगुम वाले बाबा के नाम से जाने जाते थे, वो चिवंगम चबाते रहते थे और सबसे कहते थे की चिवंगम खाने से तन और मन दोनों की व्याधियां मिट जाती हैं, बाबा बनने के पीछे कुछ कारण छिपे होते हैं,आइये एक बाबा का किस्सा बयाँ करता हूँ!कोई फ़िल्मी स्टार आने वाला था, बहुत भारी भीड़ लगी थी, उसी भीड़ मैं एक बेरोजगार युवक जिसके दाढ़ी काफी लम्बी लम्बी थी,अपने दोस्त के साथ खडा था, जिसको खैनी खाने की लत थी, और खैनी खाकर कहीं भी थूक देना उसके लिए आम बात थी, तो आदतन उसने थूका और थूक पास मैं खड़े नौजवान पर जा गिरा और नोजवान भी ऐसा तगड़ा हट्टा कट्टा की अगर थप्पड़ रसीद कर दे तो डॉक्टर के पास इलाज न मिले, अब ऐसे व्यक्ति पर थूक गिरना मतलब सरे आम मुसीबत को गले लगाना था,वही हुआ नौजवान गुस्से से फुंफकारता हुआ, दढियल की तरफ लपका और गिरेबान को ऐसे पकडा जैसे कसाई बकरे को पकड़ता है, दढियल लट्पटाने लगा, नौजवान गुस्से से बोला : क्यों बे थूकने से पहले देख नहीं सकते?? अब दढियल क्या बोले गिरेबान छूटे तो हलक से आवाज निकले, पर उसी समय दढियल के दोस्त ने मोर्चा संभाला और बोला : अरे मुर्ख नौजवान क्या कर रहे हो इतने पहुंचे हुए महात्मा को इस कदर बेइज्जत कर रहे हो? नौजवान थोडा चकराया बोला: काहे का महात्मा ? दढियल का दोस्त बोला:अबे ये थूक वाले बाबा है जिसका कल्याण करना होता है बिना पूछे थूक देते हैं, लेकिन नौजवान कहाँ मानने वाला था बोला : आज ऐसा इलाज करूँगा की थूकने का बोलने से भी इनके गले से थूक नहीं निकलेगा, बाबाजी बनते हैं? अब इसी धक्का मुक्कि में दढियल को नौजवान के पाकेट मैं रखी लॉटरी की टिकट दिख गयी, अब दढियल बोला; उहू हु हु हु हु बच्चा तुम्हारी बहुत जल्दी एक करोड़ की लाटरी लगने वाली है, अब ये बात नौजवान को जम गई वो सोचने पर मजबूर हो गया की आखिर इसको कैसे पता चला की मैंने प्लेविन की एक करोड़ की लाटरी ले रखी है चमत्कार को नमस्कार है एक करोड़ की लाटरी आ रही है अगर बाबाजी को नाराज कर दिया तो आती हुई किस्मत रोक देंगे बाबा, नौजवान का गुस्सा ऐसे गायब हो गया जैसे गुस्से मैं भरी हुई माँ का गुस्सा अपने बच्चे को चोट लगने से गायब होता है, नौजवान दढियल के चरणों मैं लोटते हुए कहने लगा : बाबजी मुझे माफ़ कर दीजिये मैं अज्ञानी,मुर्ख नासमझ, नादान,परेशान,आपकी महिमा को समझ नहीं पाया, अब दढियल ने थोडी चैन की सांस ली, काफी भीड़ इक्कठी हो गयी इस माजरे मैं,नौजवान कहता रहा : बाबाजी मेरे एक करोड़ मत रोकिये उन्हें आने दीजिये, मैं बहुत गरीब आदमी हूँ बाबाजी, एक बार और थूक दीजिये बाबाजी एक बार और,दढियल बड़ी शान से बोला: घबरा मत बच्चा हम तो दुनिया के मान अपमान से परे हैं, आकथू!!!! और दढियल ने बची हुई खैनी का सारा झोल नौजवान के ऊपर उडेल दिया, नौजवान : मैं धन्य हो गया बाबाजी मैं धन्य हो गया, अब बाबाजी ने सोचा अब यहाँ से कल्टी मार लेने में ही भलाई है, दढियल बोला: ठीक है बच्चा अब जाओ और देखो दो दिन नहाना मत, (खैर सब बाबाओं की कुछ न कुछ अलग विशेसता तो दिखानी पड़ेगी न भाई) अब नौजवान चला गया, दढियल और उसका दोस्त अपनी खैर मनाते हुए घर की और चले की भाई जान बची तो लाखों पाए, बात को तीन दिन ही बीते थे की उस नौजवान की संजोग से सचमुच एक करोड़ की लाटरी निकल पड़ी, अब तो नौजवान दढियल को ढूँढ़ते ढूदते दढियल के घर पहुँच लिया, अब दढियल ने दूर से देखा तो झट पहचान गया, पहचानना तो था ही मुसीबत को कोई कैसे भूल सकता है,दढियल ने सोचा अब खैर नहीं ये आज बाबाजी बना के छोड़ेगा, इससे पहले की दढियल कुछ कहता नौजवान दंडवत करते हुए बोला : धन्य हो बाबाजी आप धन्य हो,मुझ गरीब का आपने कल्याण कर दिया बाबाजी मेरी लोटरी लगा दी,मुझे एक करोड़ रुपैये मिले हैं बाबा और मिलते ही मैं आपके पास आया हूँ, अब दढियल ने स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए स्थिति को काबू मैं किया बोले: उहू हु हु हु हु बच्चा हमें पता है, नौजवान बोला: बाबाजी आपके भंडारे मैं दस लाख चढाना चाहता हूँ ना मत कीजियेगा नहीं तो मेरा दिल दुखेगा, दढियल की आंखें चमक गयी, खैनी को मन ही मन धन्यवाद देता हुआ बोला: देखो बच्चा माया मोह से हम बंधे नहीं है पर तुमने हमें अपने बस कर लिया तो मना भी नहीं कर सकते भगवन तो भक्तों के बस होते हैं,जब तुम इतनी जिद ही कर रहे हो तो दस नहीं ग्यारह लाख चढा दो, शुभ होते हैं, नौजवान ख़ुशी से झूमता हुआ: बाबाजी आपने मेरी विनती स्वीकार करके मुझ पर एक और अहसान किया है, कहकर चरणों में ऐसा लेटा की उठने का नाम नहीं ले रहा प्रेमाश्रुओं की झडी लग गयी वातावरण पूरा भक्तिमय हो उठा, जोर से टिली मार के नौजवान ने जयकारा लगाया :थूक वाले बाबा की जय!!अब आस पास के लोगों मैं भी श्रद्धा जगी और थुकवाले बाबा के जयकारों से वातावरण गूंज उठा, अब क्या था सब बाबा जी से थुकवाने लगे, कईयों के काम संजोग से बन जाते, बाबाजी का चर्चा दूर दूर तक फैलता गया, बाबाजी और बाबाजी का दोस्त दोनों चढावे से मौज करने लगे, दूर दूर राज्यों से लोग आने लगे बाबाजी का पर्चा लोगों को रास आ रहा था पर इतना थूक कहाँ से लायें, अब तो बाबाजी थूक को वेस्ट भी नहीं कर सकते थे, रात को सोते वक़्त का थूक लोटे मैं जमा करते, पान खा कर लाल पिक भी डब्बियों मैं पेक करते,सोच के समय का थूक भी डब्बियों मैं जमा करते, अब जो दूर से आते थे वो डब्बियों वाला थूक ले कर जाते थे, कोई पूछता महाराज ये लाल थूक कोनसे कस्ट निवारण करता है, बाबाजी समझाते: बच्चा ये लाल थूक पानासन थूक है इससे दरिद्रता नस्ट होती है और घर मैं लाल कागज में रखने वाला सामान(सोना) आता है! और ये जो सफ़ेद वाला थूक है न ये सोचासन के समय का थूक है इससे कब्ज, एसिडीटी, और उदर के सारे कस्ट मिटते हैं! भीड़ इतनी की पूछो मत लोग थुकवाने के लिए उतावले अब माइक पे अनाउंस भी हो रहा है: कृपया लाइन से थुकवाने आते रहे, जिन्होंने थुकवा लिया है वो आगे बढ़ते रहें, एक आदमी एक बार ही थुक्वाए, माता बहनों को पहले थुकवाने देवें, बच्चों को थुकवाने के लिए गोदी मैं ले के रखें, और जो अपने साथ अपने लोगों को नहीं ला सके उनके लिए थूक की डब्बियों की व्यवस्था की गयी है ड्ब्बीयाँ ले जावें, और कृपया बाबाजी को अच्छी खैनी चढावें, थोडी देर रुक जाइये बाबाजी खेनासन कर रहें हैं (खैनी खा रहें हैं), बस अब क्या था बाबाजी से थुकवाने चुनाव के समय नेता लोग भी आने लगे,बाबाजी कहते असली थूक तो आप के लिए ही है,जनता बेचारी भोली है ओरिजनल थूक तो आप लोगों पर थूकता हूँ !!!आक थू!!!!!

Tuesday, May 5, 2009

"महाराज चिरक देवजी "

राजस्थान जिस्यो फुटरो नाम बिस्यो ही फुटरो ठाँव पण देवी देवतां गी लम्बी कतार जै कंप्यूटर मैं भी नाम लिखाण बैठां तो नावड़ं कोनी!

कोई शुभ काम होवंतो होवे तो सगळ देवी देवतां ने याद करना जरूरी हैं! जे एक ही भूली चुकी मैं कोई देवता छुट्ग्यो तो बो किन्न्गेई मुंडे बोलतो देर कोनी लगावे!और देवी देवता इता हैं क कम्पुटर में भी लिखन बैठ ज्यावां तो नावाड़ें कोनी, और नित नया देवता आवण लगरया हैं! एक इस्ये ही देवतागी मैंने याद आ री है "महाराज चिरक देवजी "तो हुयो इयान की मेघवालनी आपगे टाबर ने गोदी मैं लेगे ब्राह्मणा ग गाँव गई! अब टाबर गो पेट खराब हो जियां ही मेघवालनी मिन्दर क आगें गई टाबर चिरक दियो, शुद्ध भासा मैं कवुं तो टट्टी बैठ दियो! इतेने मेघवालनी देख्यो मिन्दर मिया पंडितजी चढावे गा पिस्सा गिनता ही आ रयाँ हैं! मेघवालनी सोच्यो हे भगवान् अब के होसी एक तो जातगी मेघवाल दुसरो टाबर टट्टी बैठ दियो और बोई मिन्दर ग आगें! एतो सेई मेधा रलग्या, जे हुवे तो कोई बुद्धि लगा, अब माथे गा लोटिया चस्या! जोरस्युं टिली मारी :- हे महाराज थारी जय हो ! जय हो चिरक देवजी महाराज की जय हो ! पंडितजी देख्यो ओ के सांग है! पंडितजी हौले हौले कने गया, बोल्या कुन है बाई !! मेघवालनी भोड हला हला बोली:- परगटग्या परगटग्या चिरक देवजी परगटग्या!!! आंगळी स्यूं चिरको दिखावंती बोली बो देखो रात ही सपनो आयो क इं गाँव मैं कलियुग को अवतार चिरक देव परगट होसी और बो मने दिखसी! प्रभु इच्छा स्यूं मैं आई और दिख्ग्यो मैं धन्य होगी !! पंडितजी गो इतो सुणनो हो की दंडवत करण लागग्या और गाँव मैं ढ़ीन्ढ़ोरो पिट दियो अबं गाँव उमड्यो, लुगायां गीत बढावा गावंती ही आई !

बात दूर दूर ताई पूगी दूर दूर गांवां स्यूं लोग आया, कई पैदल यात्र्याँ का दल आया, अबं लोगाँ सोच्यो क भाई मंदिर बनायो जावे बडो हवन कार्यो जावे, बड़े बड़े साधू महात्मा ने बुलाया गया, बात मीडिया मैं पतों लगी, सगला समाचार चैनल हाळा कैमरा ले ले गे आग्य्गा ,अब लाग्या बीं चिरक की फोटुवाँ लेवन न, कई दिना रो हुने स्यूं कल्डो हुग्यो, पण भाई चिरक देवता तो चिरक देवता ही हैं कल्डो हुवो चाहे कंवलो हो! लोग हाथ लगा लगा सर ग लगाँव, अब टीवी चंनेलाँ पर एक ही समाचार "कलियुग के अवतारी महाराज चिरक देवजी" प्रगत हुए आइये ले चलते है आपको उस जगह जहां ये कलियुगी अवतार श्री महाराज चिरक देवजी प्रगट हुए हैं, सीधे प्रसारण मैं चिरका दिखा रहे हैं , ख्याति पुरे संसार भर मैं फेल गयी, बहुतों की मनो कमाना पूरी हुई, अब चिरक चालीसा , चिरक मंत्र , चिरक स्तुति, चिराकनान्दजी की आरती, वगेरह वगेरह सभी बने, लोग चिरक देव की लहरी , चिरक देव का बेज, चिरक देवजी का मादलिया लगा लगा के घूम रहे हैं,