Friday, August 5, 2011
Tuesday, July 12, 2011
ज़रा हंस भी लो !!!
अमेरिकी के घर पे जापानी और इंडियन बंगाली बाबु दारु पी रहे थे ! अमेरिकी ने दो पैग लेने के बाद अपना ग्लास उल्टा रख दिया! जापानी ने सीधा रखा ! बंगाली बाबु उलझन में मैं किस स्टाइल में रखूं ?? अब बुद्धि की बत्ती जली और बंगाली बाबु ने ग्लास आड़ा रख दिया! इस हरकत को देख अमरीकी और जापानी ने बंगाली बाबू से आड़ा ग्लास रखने का कारन पूछा ! बंगाली बाबु ने उनसे सीधा और उलटा ग्लास रखने का कारण पूछा ! अमरीकी बोला :- मुझे और दारु नहीं चाहिए इसलिए मैंने उलटा रखा!!
जापानी ने बताया उसे और पीनी थी इसलिए सीधा रखा !! इस पर बंगाली बाबू बोले : मैंने आड़ा इसलिए रखा की और होगी तो ले लेंगे नहीं तो कोई बात नहीं !! इसलिए कहता हूँ!! हमेशां आड़ा रहो ! मिले तो ले लो न मिले तो कोई गम नहीं!!!
जापानी ने बताया उसे और पीनी थी इसलिए सीधा रखा !! इस पर बंगाली बाबू बोले : मैंने आड़ा इसलिए रखा की और होगी तो ले लेंगे नहीं तो कोई बात नहीं !! इसलिए कहता हूँ!! हमेशां आड़ा रहो ! मिले तो ले लो न मिले तो कोई गम नहीं!!!
Saturday, May 28, 2011
एक और भजन की प्रस्तुति !
नमस्कार दोस्तों ! पेशे खिदमत है एक और भजन जो मैंने अपने गांव के ही मंदिर में फिल्माया है !!! आप सब की हौशला अफजाई की कामना करता हूँ !!!
Friday, March 18, 2011
पिंजरे का पंछी!!!
इस भजन को लिखकर ट्रेक पर मैंने ही गाया और अभिनय किया है ! अत: आपका प्रोत्साहन जरुरी है !!
Sunday, March 6, 2011
Sunday, July 11, 2010
पोजिटिव थिंकिंग के बारे में आप क्या सोचते हैं?????
सचमुच सकारात्मक सोच के जादू का तब तक पता नहीं चलता जब तक हम आजमा के न देख लेवें! अब अविनाशजी ने बिजली न होने से भी खुश रहना सिख लिया ! यही महान व्यक्तियों की सोचने की कला है !
महान व्यक्तियों के सोचने की दिशा हमेशां अलग रही है !
अविनाश जी का कहना है की बिजली नहीं रहने से टी . वी नहीं देख पाते , मोबाइल से बात नहीं कर पाते ,पर हम तो भाई बिना बिजली के भी कैसे न कैसे करके टी .वी मोमबती जला के भी देखते रहते हैं, की इसी में तो सब कुछ आता है, और कभी भी वो सब वापस आ सकते हैं जो बिजली के साथ गए हैं!
मोबाईल पर बीवी की झकझक सुनने से बचने के लिए झूठ मुठ ही बतियाते रहते हैं : हां जी कल मैं पैसे के लिए आ रहा हूँ , नहीं यार कम से कम 15-20 तो कर देना ......ओके ...हाँ ..हाँ ... हेल्लो ..हाँ फोन रखना नहीं यार ...बड़ी लम्बी बात करनी हैं......यार ..a to a फ्री है न. हाँ ... कभी तो बिजली आयेगी ! उम्मीद पर तो दुनिया कायम हैं और पोजिटिव थिंकिंग का जादू चल ही जाता है! सिर्फ दो घंटे के बाद ही लाइट आ जाती है , ये बताने की आपने ये जो घर में मीटर बिठा रखा है और जो तारें लगा राखी हैं व्यर्थ नहीं हैं इन्हें उखाड़ने का प्रयास भी ना करें!
अभी कुछ दिन से खाना अकेला ही पका रहा हूँ इसीलिए ब्लोगिंग का समय नहीं मिल पाता काम धंधा ज़माने के लिए मेहनत कम और पोजिटिव थिंकिंग ज्यादा करता हूँ !
अब रसोई में जगह जगह चीनी के गिरने से मोटे वाले मकोड़ों ने धावा बोल दिया ! रोज आने लगे मैंने गौर किया इनकी थिंकिंग इतनी पोजिटिव हैं, की रोज ये पक्का विस्वास करके आते हैं की कहीं न कहीं मीठा खाने को मिल ही जाएगा !
सचमुच मिल ही जाता है कभी चाय के सस्पेन में , कभी ग्लास में और कभी चीनी का डब्बा खुला रह जाता है ! सचमुच यहाँ पर दो बातें चरितार्थ होती है एक ये की शक्कर खोरे को शक्कर मिल ही जाती है और दूसरी ये की पोजिटिव थिंकिंग रखने से जादुई परिणाम निकलते हैं !
अब कल गैस ख़त्म हो गई तो दो दिन कुछ बना नहीं मकोड़ों ने पलायन शुरू कर दिया ! एक दो मकोड़े कुछ ज्यादा ही पोजिटिव थिंकिंग वाले थे जो बहुत पतले हो गए थे , पर जी जान से इधर उधर भटक रहे थे की कहीं ना कहीं तो कुछ मीठा मिलेगा ही मिलेगा !
मैंने रसोई में कदम रक्खा तो सुनी पड़ी रसोई को देखकर जरा मन उदास हो गया ! जिन मकोड़ों से मैं बातचीत करते रहता हूँ वो मकोड़े गायब हो गए हैं ! मैंने देखा दो मकोड़े जो थिंक थिंक के दम तोड़ने वाले थे, बस वही बचे थे !
मैंने चीनी का घोल बनाया और उनके सामने परोस दिया ...पर ये क्या .. वो दोनों मकोड़े चीनी के घोल को सूंघ कर दौड़ पड़े मैंने सोचा, शायद ये सोच रहे हैं की इसमें कोई साजिस है ! मन व्यथित हो गया उनको कितना समझाया की यार किसी इन्सान पर तो विस्वास करलो !
पर नहीं माने और वाश बेशन के निचे वाली गली से पतले हो लिए .
इनको समझाने और चीनी का घोल देने में मेरा स्वार्थ था, मकोड़ों की पोजिटिव थिंकिंग का असर,
मुझे लगता था की मकोड़े हमेशां यही सोचते हैं की यहाँ मीठा मिलेगा और मीठा तभी घर में बनेगा जब ख़ुशी रहेगी और ख़ुशी तभी रहेगी जब एंटी में दमड़ी रहेगी, इतना बड़ा लंबा पोजिटिव थिंकिंग का जाल ....!
एक आदमी की पोजिटिव थिंकिंग से अगर कम नहीं बनता है तो इतने मकोड़े मील कर अगर पोजिटिव थिन्कियायेंगे तो रिजल्ट अच्छा आना ही आना है!
अच्छा अब जो दो मकोड़े चले गए थे वो वापस आ गए साथ में और कई मकोड़े मकोड़ीया भी थे !
बात अब समझ में आइ की वो भागे नहीं थे बल्कि सब को बुलाकर लाये थे !
अगर मकोड़ों की सोच से सोचा होगा तो यही सोचा होगा की हम अकेले क्यूँ खाएं सबको खिलाएं , और अगर इंसानों की सोच से सोचा होगा तो मकोड़ों ने ये सोचा होगा की अगर ये घोल देने में कोई साजिश है तो पहले दूसरों को खिला के देखते हैं या साजिस का शिकार हम अकेले क्यूँ बने !!
खैर मकोड़ों ने जो भी सोचा !! पोजिटिव थिंकिंग के बारे में आप क्या सोचते हैं?????
अब एक सवाल यहाँ निचे प्लयेर में !!(song Ek swal tum karo Flute)
महान व्यक्तियों के सोचने की दिशा हमेशां अलग रही है !
अविनाश जी का कहना है की बिजली नहीं रहने से टी . वी नहीं देख पाते , मोबाइल से बात नहीं कर पाते ,पर हम तो भाई बिना बिजली के भी कैसे न कैसे करके टी .वी मोमबती जला के भी देखते रहते हैं, की इसी में तो सब कुछ आता है, और कभी भी वो सब वापस आ सकते हैं जो बिजली के साथ गए हैं!
मोबाईल पर बीवी की झकझक सुनने से बचने के लिए झूठ मुठ ही बतियाते रहते हैं : हां जी कल मैं पैसे के लिए आ रहा हूँ , नहीं यार कम से कम 15-20 तो कर देना ......ओके ...हाँ ..हाँ ... हेल्लो ..हाँ फोन रखना नहीं यार ...बड़ी लम्बी बात करनी हैं......यार ..a to a फ्री है न. हाँ ... कभी तो बिजली आयेगी ! उम्मीद पर तो दुनिया कायम हैं और पोजिटिव थिंकिंग का जादू चल ही जाता है! सिर्फ दो घंटे के बाद ही लाइट आ जाती है , ये बताने की आपने ये जो घर में मीटर बिठा रखा है और जो तारें लगा राखी हैं व्यर्थ नहीं हैं इन्हें उखाड़ने का प्रयास भी ना करें!
अभी कुछ दिन से खाना अकेला ही पका रहा हूँ इसीलिए ब्लोगिंग का समय नहीं मिल पाता काम धंधा ज़माने के लिए मेहनत कम और पोजिटिव थिंकिंग ज्यादा करता हूँ !
अब रसोई में जगह जगह चीनी के गिरने से मोटे वाले मकोड़ों ने धावा बोल दिया ! रोज आने लगे मैंने गौर किया इनकी थिंकिंग इतनी पोजिटिव हैं, की रोज ये पक्का विस्वास करके आते हैं की कहीं न कहीं मीठा खाने को मिल ही जाएगा !
सचमुच मिल ही जाता है कभी चाय के सस्पेन में , कभी ग्लास में और कभी चीनी का डब्बा खुला रह जाता है ! सचमुच यहाँ पर दो बातें चरितार्थ होती है एक ये की शक्कर खोरे को शक्कर मिल ही जाती है और दूसरी ये की पोजिटिव थिंकिंग रखने से जादुई परिणाम निकलते हैं !
अब कल गैस ख़त्म हो गई तो दो दिन कुछ बना नहीं मकोड़ों ने पलायन शुरू कर दिया ! एक दो मकोड़े कुछ ज्यादा ही पोजिटिव थिंकिंग वाले थे जो बहुत पतले हो गए थे , पर जी जान से इधर उधर भटक रहे थे की कहीं ना कहीं तो कुछ मीठा मिलेगा ही मिलेगा !
मैंने रसोई में कदम रक्खा तो सुनी पड़ी रसोई को देखकर जरा मन उदास हो गया ! जिन मकोड़ों से मैं बातचीत करते रहता हूँ वो मकोड़े गायब हो गए हैं ! मैंने देखा दो मकोड़े जो थिंक थिंक के दम तोड़ने वाले थे, बस वही बचे थे !
मैंने चीनी का घोल बनाया और उनके सामने परोस दिया ...पर ये क्या .. वो दोनों मकोड़े चीनी के घोल को सूंघ कर दौड़ पड़े मैंने सोचा, शायद ये सोच रहे हैं की इसमें कोई साजिस है ! मन व्यथित हो गया उनको कितना समझाया की यार किसी इन्सान पर तो विस्वास करलो !
पर नहीं माने और वाश बेशन के निचे वाली गली से पतले हो लिए .
इनको समझाने और चीनी का घोल देने में मेरा स्वार्थ था, मकोड़ों की पोजिटिव थिंकिंग का असर,
मुझे लगता था की मकोड़े हमेशां यही सोचते हैं की यहाँ मीठा मिलेगा और मीठा तभी घर में बनेगा जब ख़ुशी रहेगी और ख़ुशी तभी रहेगी जब एंटी में दमड़ी रहेगी, इतना बड़ा लंबा पोजिटिव थिंकिंग का जाल ....!
एक आदमी की पोजिटिव थिंकिंग से अगर कम नहीं बनता है तो इतने मकोड़े मील कर अगर पोजिटिव थिन्कियायेंगे तो रिजल्ट अच्छा आना ही आना है!
अच्छा अब जो दो मकोड़े चले गए थे वो वापस आ गए साथ में और कई मकोड़े मकोड़ीया भी थे !
बात अब समझ में आइ की वो भागे नहीं थे बल्कि सब को बुलाकर लाये थे !
अगर मकोड़ों की सोच से सोचा होगा तो यही सोचा होगा की हम अकेले क्यूँ खाएं सबको खिलाएं , और अगर इंसानों की सोच से सोचा होगा तो मकोड़ों ने ये सोचा होगा की अगर ये घोल देने में कोई साजिश है तो पहले दूसरों को खिला के देखते हैं या साजिस का शिकार हम अकेले क्यूँ बने !!
खैर मकोड़ों ने जो भी सोचा !! पोजिटिव थिंकिंग के बारे में आप क्या सोचते हैं?????
अब एक सवाल यहाँ निचे प्लयेर में !!(song Ek swal tum karo Flute)
Saturday, June 26, 2010
लम्बी जुदाई !!!!
साढ़े तीन महीने के लम्बे ब्लॉग वियोग के बाद मौक़ा मिला है, की आज अपनी विरह व्यथा लिखी जाए!
सचमुच बड़ी ही दुसह दुख:द और दुस्वार होती है ब्लॉग जुदाई! मायावी दुनिया की आपा धापी में ब्लॉग जगत के आत्मिक रस से वंचित रहना किसी क्रोधित ऋषि के श्राप भोगने जैसा है !
ऐसा लगता है जैसे पिजरे में से पंछी उड़ गया हो, खूंटे से गाय खुल गयी,कोल्हू से बैल निकल गया हो!जैसे पिंजरा, खूंटा और कोल्हू सुन्ने हो जाते हैं वैसे ही इस भारी भरकम शरीर में लगा हुआ ४० किल्लो का सर सुन्ना घर सा हो जाता है !
भगवान् दुश्मन को भी ब्लॉग विरह ना दे ,किसी बेनामी को भी ऐसी सजा ना दे!
जब भी किसी गधेडे को देखता तो ब्लॉग पात्र संतू की याद से मन व्यथित हो जाता था ! वो काली काली आँखों वाली, लम्बे लम्बे पूंछ वाली, चम्पाकली भैंस अक्सर सपनो में आ कर रंभाती थी !वो नरम नरम पैरों वाली, भूरी भूरी आँखों वाली, कोमल कोमल होठों वाली, मेरे पास आ करती थी म्याऊं !! तो रामप्यारी की याद से सुन्ना पड़ा माथा गूंजने लगता था !
साढ़े तीन महीने का दुनिया वास भोगने के बाद आज वापस ब्लॉग जगत में आना वैसा ही सुखद है जैसे लम्बी यात्रा कर अपने घर में पहुँचना!
सचमुच बड़ी ही दुसह दुख:द और दुस्वार होती है ब्लॉग जुदाई! मायावी दुनिया की आपा धापी में ब्लॉग जगत के आत्मिक रस से वंचित रहना किसी क्रोधित ऋषि के श्राप भोगने जैसा है !
ऐसा लगता है जैसे पिजरे में से पंछी उड़ गया हो, खूंटे से गाय खुल गयी,कोल्हू से बैल निकल गया हो!जैसे पिंजरा, खूंटा और कोल्हू सुन्ने हो जाते हैं वैसे ही इस भारी भरकम शरीर में लगा हुआ ४० किल्लो का सर सुन्ना घर सा हो जाता है !
भगवान् दुश्मन को भी ब्लॉग विरह ना दे ,किसी बेनामी को भी ऐसी सजा ना दे!
जब भी किसी गधेडे को देखता तो ब्लॉग पात्र संतू की याद से मन व्यथित हो जाता था ! वो काली काली आँखों वाली, लम्बे लम्बे पूंछ वाली, चम्पाकली भैंस अक्सर सपनो में आ कर रंभाती थी !वो नरम नरम पैरों वाली, भूरी भूरी आँखों वाली, कोमल कोमल होठों वाली, मेरे पास आ करती थी म्याऊं !! तो रामप्यारी की याद से सुन्ना पड़ा माथा गूंजने लगता था !
साढ़े तीन महीने का दुनिया वास भोगने के बाद आज वापस ब्लॉग जगत में आना वैसा ही सुखद है जैसे लम्बी यात्रा कर अपने घर में पहुँचना!
Monday, February 8, 2010
हम तो जाते अपने गाँव !!!
परदेश की आबो हवा अब रास ना आवे |
घर आजा परदेशी तेरा देश बुलावे ||
वो सुनहले धोरे कितना मुझको मिस करते है|
कब आवोगे साथी मनमे कितना रिस करते हैं ||
जाने कब आये ये फरवरी ११ का दिन |
एक एक साल लगे है हर पल हर छीन||
कुछ दिन कुछ ना कहूंगा |
दिल के करीब ब्लॉग से दूर रहूंगा !!!
घर आजा परदेशी तेरा देश बुलावे ||
वो सुनहले धोरे कितना मुझको मिस करते है|
कब आवोगे साथी मनमे कितना रिस करते हैं ||
जाने कब आये ये फरवरी ११ का दिन |
एक एक साल लगे है हर पल हर छीन||
कुछ दिन कुछ ना कहूंगा |
दिल के करीब ब्लॉग से दूर रहूंगा !!!
Tuesday, February 2, 2010
देश और देशवाशी !!!
रात को एक टीस सी दिल के कौने में उठ रही थी!
दिल के दर्द से अनजान था, आखिर कौन सी पीड़ा घुट रही थी!!
जुबान से पूछा दिल मैं क्या दर्द है बता, ज़ुबां कुछ न कह पाई
पर गम का वो गुब्बारा आखिर फूट पड़ा और आँख भर आई
हाथ ख़ुद ब ख़ुद जुड़ गए और वतन को सलाम किया |
मैं क्योँ भुला रहा तुझे कभी तेरे लिए कोई काम न किया ||
उलझे रहते हैं अपनी ही दुनिया में, तेरे हालात अब बद से बदतर हो पड़े |
देश और देशवाशियों के हालात पे हम फूट फूट कर रो पड़े||
दिल के दर्द से अनजान था, आखिर कौन सी पीड़ा घुट रही थी!!
जुबान से पूछा दिल मैं क्या दर्द है बता, ज़ुबां कुछ न कह पाई
पर गम का वो गुब्बारा आखिर फूट पड़ा और आँख भर आई
हाथ ख़ुद ब ख़ुद जुड़ गए और वतन को सलाम किया |
मैं क्योँ भुला रहा तुझे कभी तेरे लिए कोई काम न किया ||
उलझे रहते हैं अपनी ही दुनिया में, तेरे हालात अब बद से बदतर हो पड़े |
देश और देशवाशियों के हालात पे हम फूट फूट कर रो पड़े||
Wednesday, January 27, 2010
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