Tuesday, February 2, 2010

देश और देशवाशी !!!

रात को एक टीस सी दिल के कौने में उठ रही थी!
दिल के दर्द से अनजान था, आखिर कौन सी पीड़ा घुट रही थी!!
जुबान से पूछा दिल मैं क्या दर्द है बता, ज़ुबां कुछ न कह पाई
पर गम का वो गुब्बारा आखिर फूट पड़ा और आँख भर आई



हाथ ख़ुद ब ख़ुद जुड़ गए और वतन को सलाम किया |
मैं क्योँ भुला रहा तुझे कभी तेरे लिए कोई काम न किया ||
उलझे रहते हैं अपनी ही दुनिया में, तेरे हालात अब बद से बदतर हो पड़े |
देश और देशवाशियों के हालात पे हम फूट फूट कर रो पड़े||