Tuesday, February 2, 2010

देश और देशवाशी !!!

रात को एक टीस सी दिल के कौने में उठ रही थी!
दिल के दर्द से अनजान था, आखिर कौन सी पीड़ा घुट रही थी!!
जुबान से पूछा दिल मैं क्या दर्द है बता, ज़ुबां कुछ न कह पाई
पर गम का वो गुब्बारा आखिर फूट पड़ा और आँख भर आई



हाथ ख़ुद ब ख़ुद जुड़ गए और वतन को सलाम किया |
मैं क्योँ भुला रहा तुझे कभी तेरे लिए कोई काम न किया ||
उलझे रहते हैं अपनी ही दुनिया में, तेरे हालात अब बद से बदतर हो पड़े |
देश और देशवाशियों के हालात पे हम फूट फूट कर रो पड़े||

6 comments:

  1. हाथ ख़ुद ब ख़ुद जुड़ गए और वतन को सलाम किया
    मैं क्योँ भुला रहा तुझे कभी तेरे लिए कोई काम न किया ..

    यदि हर देशवासी ऐसे ही जाग जाए ..... अपनी ग़लती का एहसास करे तो अपना देश फिर सोने की चिड़िया बन जाएगा .... अच्छी रचना है ....

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  2. .... प्रभावशाली रचना !!!

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  3. उलझे रहते हैं अपनी ही दुनिया में, तेरे हालात अब बद से बदतर हो पड़े |
    देश और देशवाशियों के हालात पे हम फूट फूट कर रो पड़े||


    -वाह!! बहुत भावपूर्ण!

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  4. भई वाह्! मुरारी लाल जी, आज पता चला कि आप तो कवितागिरी भी करते हैं :)
    बहुत बढिया लगी ये रचना...
    शुभकामनाऎँ!!!

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आपके लिए ही लिखा है आप ने टिपण्णी की धन्यवाद !!!